Sunday, July 1, 2012

Walking on the Thin Ice


Walking on a thin ice, I dwell
On the dulcet days of yore
‘tis when the pain starts to swell
But I’ve to hold my ground some more

That sound of rupture, I hear
If it is silver lining, I see?
No - its milky cracks, I fear
And I may soon be set free

If only I have the luxury
Of time, so I can wait
A little, before I be ready
To meet my final state

How can I be no delirious
How can I still rejoice
The path I tread is perilous
And I still walk on a thin ice.

Saturday, March 24, 2012

थोड़ा ज्यादा

आज कल मैं खुद से कुछ ज्यादा मांगने लगा हूँ


थोड़ी ज्यादे बड़ी खुशी, थोड़ी ज्यादे लंबी हंसी

थोड़े जीत के लम्हें ज्यादे, थोड़ा बेहतर होने का एहसास;


स्वार्थ है या बेवकूफी

लालच है या चुनौती

है अहंकार या कुछ भी नहीं

नशा सा है जो भी है ये;


कभी जब बर्दाश्त तक चढती है

तो मजा देती है

हर वो काम जो चंद लम्हों पहले कठिन लगता था

कर लेता हूँ

और फिर थक कर जब बैठता हूँ

तो फुले नहीं समाता

देख के अपनी ही रचना को;

कभी जब बर्दाश्त तक चढती है

तो उतरने के बाद भी मजा देती है


कभी जब सर पर चढ़ जाये

तो सब उल्टा हो जाता है

दुनिया भी, काम भी और नशे का अंजाम भी

हर सरल तरीके से भरोसा उठ जाता है

और हर काम कठिन हो जाता है

इतना पूर्ण तो उसका संसार भी नहीं

जितना मैं चाहता हूँ;

कभी जब सर पर चढ़ जाये

तो न उतरने में ही भला होता है


हर नशे की तरह ये नशा भी बुरा है

मुझे भी लगता है, तुम भी कहोगे

इतना भी ना मांगो खुद से कि

खोखले हो जाओ|

Wednesday, December 28, 2011

एक अधूरी कविता

पड़ी है कमबख्त कब से

उसी कोने में

समझ खाला का घर जैसे

बैठ गयी है पैर तोड़

“अरे दिन के दिन जा रहे हैं

तू कब जाएगी?

घंटे बोल के आई थी

महीने निकल गयें

तू कब निकलेगी?


झाँक जरा बाहर खिड़कियों से

आसमान खुला है

इन्द्रधनुष खिला है

पुष्प की पंखुड़ियों पे पड़ी

बारिश की बूंदें सरक रहीं हैं

तू कब सरकेगी?


सुन तो जरा दरवाजे पे पड़ी दस्तक

काफी देर से आ रही है

कुछ तो कहे जा रही है

यूँ खटखटाते खटखटाते थक कर

राही चल देगा

तू कब चलेगी?


मेरी कल्पना की दुनिया से

नीरस इस जहां में

जो आना ही न था

एक पाँव निकाल के दूसरा

जो बढ़ाना ही न था

तो दुर्दशा दिमाग की ना करती

उसी कल्पना की दुनिया में रहती

बचे अधूरेपन को उसी जहां में भरती |

Sunday, October 2, 2011

अंतर्द्वन्द्व

एक तू मुझमें ही मुझ जैसा नहीं!
मैं कहूँ जो मैं करूँ जो - सब गलत, बस तू सही!
एक तू मुझमें ही मुझ जैसा नहीं!

हो मुनासिब जो मुझे, मुश्किल हो तेरी,
हो उदासी जो मेरी, महफ़िल हो तेरी,
चाहता हूँ मैं जिसे हो दूर मुझसे,
है बखूबी जानता, मंजिल वो तेरी,

जो मुझे प्यारा है जिसकी आरज़ू है,
क्यूँ सुहाता है नहीं तुझको वही,
एक तू मुझमें ही मुझ जैसा नहीं!

जो तरीकों से मेरे दुनिया ख़फा हो,

लेश भर परवाह मुझको क्यूँ भला हो,
क्या नया इसमें, सुनूँ उसकी मैं क्यों फिर,
जो मेरी हर एक तरक्की से जला हो,

लड़ भी जाऊं मैं अकेले जग से लेकिन,
अनसुनी कर दूँ मैं कैसे ये नसीहत अनकही,
एक तू मुझमें ही मुझ जैसा नहीं!

ठान कर हर बार जो घर से निकलता हूँ,
एक रस्ता एक ही गंतव्य रखता हूँ,
पथभ्रमित मुझको बनाके ख़ूब खुश होता,
मैं विकल्पों की अति में ही तो मरता हूँ,

खा तरस कर अब रहम थोड़ा यहाँ मुझपे,
जो कहा शुरुआत में था, मान ले एक बारगी,
एक तू मुझमें ही मुझ जैसा नहीं!

Thursday, April 14, 2011

A STORY

Two versions of a story –

One bitter, one sweet

One murky, one neat

Two versions of a story –

One heavy, one light

One rare, one trite

Two versions of a story –

So different together, so same apart

None right, none wrong – both in part.